sanjay kumar maurya

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ऋतु बसंत - Poem by sanjay kumar maurya

गेहूॅ की बालियां
सरसो के फूल पीले पीले
मटर के छिमी गूच्छे गूच्छे
आम के मोजर लगते कितने अच्छे
पछुआ सिहराती गात छू कर मधुर
कोयल लगाती डाल पर असंख्य कूकें
मुरझाए चेहरे खिलने लगे
शोखियों के बान चलने लगे
अरे ये कौन आया कांधा की नगरी
वातावरण को मोहक मनभावन करता
कहीं ये बसंत तो नहीं
जो पिछले साल इसी भाॅति आया था।

Topic(s) of this poem: weather


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Poem Submitted: Thursday, September 3, 2015



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