Ajay Srivastava

Gold Star - 11,191 Points (28/08/1964 / new delhi)

निशुल्क - Poem by Ajay Srivastava

घास पर ओस की बूंद ने आखो को
छण भर में ताजगी का एहसास।
ठंडी मंद लहलहाती हवाओ ने
पल भर में शरीर में स्फूर्ति का एहसास।
बीज ने कब छोटे से पौधे का रूप ले लिया
जीवन रक्षक वायु देने लगता है।
छोटी सी कली ने जब फूल बन कर
पल भर में वातावरण को सुगन्धित कर दिया।
सारा का सारा केवल हमारे स्वस्थ के लिए
निशुल्क सेवा कब और कौन करता है।

Topic(s) of this poem: friend


Comments about निशुल्क by Ajay Srivastava

  • Rajnish Manga (10/24/2015 12:34:00 PM)


    प्रकृति अपनी देन की कोई कीमत नहीं मांगती. यह सबके लिए निशुल्क उपलब्ध है. कविता में इस सत्य को पूरी तीव्रता से व्यक्त किया गया है. धन्यवाद, मित्र. (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
  • Abdulrazak Aralimatti (10/24/2015 5:41:00 AM)


    Verily, the bounty of nature for man is very blissful...10 (Report) Reply

Read all 2 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Saturday, October 24, 2015



[Report Error]