Wednesday, November 4, 2015

एक मुसाफिर Comments

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हीरा बनकर भी तू, अंगूठी में जड़ा रह गया,
मुसाफिर आगे निकल गए तू खड़ा रह गया|
कभी सूरज सा जला कभी सविता सा बहा
कभी बादल सा जिया कभी कविता सा कहा
...
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Nitesh K. mahlawat
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