Tuesday, January 12, 2016

किसको कहूँ ये बात मगर, वो मैं नहीं मेरे हमसफ़र Comments

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रस्ते अधूरे छोड़ कर, अपनो से नाता मोड़ कर
पत्ते इश्क़ के तोड़ कर, बेपरवाह गुस्ताख़ जोड़ कर
एक डगर फिर एक डगर, इस नगर कभी उस नगर
शामें लिए हर राह पर, अश्को के सहारे रात भर
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Priya Guru
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Rajnish Manga 12 January 2016

बेहद भावपूर्ण. आत्म-निरीक्षण तथा मानव व्यवहार के विभिन्न पहलुओं को सामने लाती है यह कविता. अद्वितीय. एक उद्धरण: लम्हा फिर वो ढह गया, दरिया नया कोई बह गया / ले आई आवारगी किस डगर, ये उस शहर थी अब इस शहर / किसको कहूँ ये बात मगर, वो मैं नहीं मेरे हमसफ़र

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