Priya Guru


आंखे जो तेरी कुछ कहती नहीं - Poem by Priya Guru

आंखे जो तेरी कुछ कहती नहीं
बोली है मीठी अगर समझूँ कभी

जब चंदा से पुछू आज कैसी है वो
छिप छिप बादल में कह जाए सब ख्वाइशें तेरी

जब जुगनू से पुछू कभी सुनती है वो
सुन सुन सब कह जाए वो आरज़ूएं तेरी

अगर कहदे कुछ आके ये आंखे तेरी
जो सहजे ना तुझको वो मुझको सही

बस देदे तू मुझको ये दौलत भली
सजादूँ सब इनमे मैं खुशियाँ तेरी

जुस्तजू में तेरी भटकें मुसाफिर भला
इश्क़ में मर जाए बस ख्वाइशें यहीं

आंखे जो तेरी कुछ कहती नहीं
बोली है मीठी अगर समझूँ कभी

Topic(s) of this poem: love


Comments about आंखे जो तेरी कुछ कहती नहीं by Priya Guru

  • Rajnish Manga (1/12/2016 5:51:00 AM)


    आंखे जो तेरी कुछ कहती नहीं
    बोली है मीठी अगर समझूँ कभी....... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति और कल्पनाशीलता. धन्यवाद.
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Poem Submitted: Tuesday, January 12, 2016

Poem Edited: Tuesday, January 12, 2016


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