Priya Guru


एक लम्हा - Poem by Priya Guru

एक लम्हा मुझे हर शाम बुलाता है
कुछ ख़ास ही है बस तेरी बात बढ़ाता है
तेरी आँखों की कभी तोह कभी तेरी बात बताता है
कहना कुछ चाहता नहीं शायद, पर मैं सुनता हूँ घोर से

यूँही जो कल था वो मुझे आज बताता है
दीवानो लायक गुफ्तगू में उलझा हूँ जब भी
कहता है मैं तुझसे हूँ और तेरी बात बताता हूँ
शतिरबाजी है उसकी जो हमारे को आज बताकर कल दिखाता है

क्या वो लम्हा तुझको भी बुलाता है
ज्यों मुझे सताकर जाता है, क्या तुझे भी सताता है
क्या होती है शतिरबाजी तेरे सायें में उसकी

तोह क्यों ना हम तुम संग एक शाम सजाते है
टूटे दिए हटाकर उस पल कुछ नए दीपक जलाते है
जो आता है हमारे पास उससे वहाँ बुलाते है
अपनी बात बताते है और अपनी बात कराते है

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Comments about एक लम्हा by Priya Guru

  • (1/15/2016 2:32:00 PM)


    ..जो आता है हमारे पास उससे वहाँ बुलाते है
    अपनी बात बताते है और अपनी बात कराते है...
    ...mentioned that moment in a beautiful way! !
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  • Rajnish Manga (1/12/2016 6:16:00 AM)


    कहता है मैं तुझसे हूँ और तेरी बात बताता हूँ
    शतिरबाजी है उसकी जो हमारे को आज बताकर कल दिखाता है.../ मानवीय सोच की परते दिखाती एक रोचक कविता. धन्यवाद, प्रिय गुरू साहिबा.
    (Report) Reply

  • Aarzoo Mehek (1/12/2016 5:53:00 AM)


    Ye lamhe hi to humara sarmaya hai...jeelo isko har pal. khoobsurat kavita Priya. (Report) Reply

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Poem Submitted: Tuesday, January 12, 2016



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