Upendra Singh 'suman'

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कागा बोले रे मोरे अँगना (भोजपुरी) - Poem by Upendra Singh 'suman'

भोरे-भोरे कागा बोले रे मोरे अंगना.
खनकि उठल गोरी कलइया में कंगना.


छम-छम-छम छ्मकेले पाँव क पयलिया.
खिलखिला के खिलि गइलीँ मनवां क कलिया.
आज अइहें परदेशी मोरे सजना.
भोरे-भोरे कागा बोले................


मह-मह महकेला घरवा ओसरवा.
किलकेला चहकेला अंगना दुअरवा.
बहके कलाई ना माने मोरा अंग ना.
भोरे-भोरे कागा बोले................


ठुमकेले मनवां के अंगना पिरितिया.
भूलि गईलीं सगरी जमंनवां क रीतिया.
बावरा भइल मन सुधिया हो तन ना.
भोरे-भोरे कागा बोले................


चहके कोयलिया नियर मोरी हो बोलिया.
सुनी-सुनी ननदी मोरी करे लीं ठिठोलिया.
सासुजी कहें तोहें बोले के ढंग ना.
भोरे-भोरे कागा बोले................


पुरुवा पवन शोख छेड़े मोरे केशिया.
कइसे क बरजीं ना माने निरबसिया.
अरे, रे निठल्ला न कर मोहें तंग ना.
भोरे-भोरे कागा बोले................


मन क मयूर नाचे कुहके कोयलिया.
कनवां में अमृत घोरे कागा क बोलिया.
चोरवा ना चोरइहे खुशी क मोरे रंग ना.
भोरे-भोरे कागा बोले................

Topic(s) of this poem: love and life

Form: ABC


Comments about कागा बोले रे मोरे अँगना (भोजपुरी) by Upendra Singh 'suman'

  • Abhilasha Bhatt (1/19/2016 12:05:00 PM)


    Reading this kind of poems gives a pleasure to heart and gives a smile....loved it...thank u for sharing :) (Report) Reply

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Poem Submitted: Tuesday, January 19, 2016

Poem Edited: Tuesday, January 19, 2016


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