नग़्मा-ए-ज़िन्दगी Poem by Ahatisham Alam

नग़्मा-ए-ज़िन्दगी

राह में थे खड़े ग़म तो लाखों मगर
मैंने मन्ज़िल को फिर भी पाना चाहा
साज़ बनती न थी लब भी जाम थे
नग़्मा-ए-ज़िन्दगी को मैंने गाना चाहा

वक़्त ने क्यों मेरे साथ ऐसा धोखा किया
छीना वो भी जो था मेरी किस्मत ने दिया
सामने ही थी मेरी मन्ज़िल मगर
आंधी हालात की ऐसी चली
छुट गया आशियाना लुट गई ज़िन्दगी
भरी बारिश में भी मेरी कश्ती जली

ऐसे हालात में तन्हा मुझे छोड़कर
अपने ही चले हैं मुझसे मुँह मोड़कर
इल्ज़ाम देता नहीं हूँ ज़माने को मैं
किस्मत ने ही मेरी किया है ये फैसला
साथी मेरे तो हैं यहाँ लाखों मगर
साथ देने के वक़्त कोई ना मिला।

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Written in May 2000 at MVIC
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