दिल का फ़साना Poem by Ahatisham Alam

दिल का फ़साना

ज़िन्दगी में मैंने ग़म को तलाशा है खुशियों को खोकर
अब किस से कहें दिल का फ़साना पलकें अपनी भिगोकर

हर मोड़ पर मैं ग़म के साये ही पाता रहा
फिर भी ज़माने को ख़ुश होने का एहसास ही दिलाता रहा
पायी है मैंने ये काटों की बगिया फूलों को बो कर
अब किस से कहें दिल का फ़साना पलकें अपनी भिगोकर

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Written on Feb 6,2000
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