क्यों कहूँ कोई सीने से लगाये मुझको Poem by Ahatisham Alam

क्यों कहूँ कोई सीने से लगाये मुझको

दर्द जितना भी हो आके रुलाये मुझको
क्यों कहूँ कोई सीने से लगाये मुझको

ये सच है कि मैं आईने की तरह बिखर जाता हूँ
टूट कर हर टुकड़ा एक नया आइना नज़र आता हूँ

मेरे आँसू अगर बहते हैं इन्हें बहने दो
बहुत बुरा हूँ तो अकेला ही रहने दो
अब तमन्ना ही नहीं कोई अपना कह के बुलाये मुझको
क्यों कहूँ कोई सीने से लगाए मुझको

Thursday, June 2, 2016
Topic(s) of this poem: love
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