दर्द जितना भी हो आके रुलाये मुझको
क्यों कहूँ कोई सीने से लगाये मुझको
ये सच है कि मैं आईने की तरह बिखर जाता हूँ
टूट कर हर टुकड़ा एक नया आइना नज़र आता हूँ
एक दर्द से मुमकिन है हर दर्द का ख़ात्मा लेकिन
मुन्तज़िर हूँ कि वो आ के मनाये मुझको
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बहुत खूब. आपके लेखन में नवीनता है और सुंदर भाव हैं. मुझे अच्छा लगा. धन्यवाद, ऐहतेशाम जी.