वो किसी और की हक़ीक़त है जो मेरी नज़र का ख़्वाब है Poem by Ahatisham Alam

वो किसी और की हक़ीक़त है जो मेरी नज़र का ख़्वाब है

मैं तुम बिन ज़िन्दा रहूँ कहाँ मुझमे इतनी ताब है
वो किसी और की हक़ीक़त है जो मेरा ख़्वाब है
कल हम ना होंगे तो तुमपे कोई इल्ज़ाम ना होगा
अगर मेरे क़रीबी लोगों में तेरा नाम ना होगा
बस यही सोच कर तुमसे दूर हो रहे हैं
इस मोहब्बत के आगे मजबूर हो रहे हैं।

Sunday, August 14, 2016
Topic(s) of this poem: love
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