अपने आँसुओं पर भी रोता हूँ और तेरे आँसुओ पर भी Poem by Ahatisham Alam

अपने आँसुओं पर भी रोता हूँ और तेरे आँसुओ पर भी

मुझसे पूछो की मंज़रे इश्क का आलम भी क्या ख़ूब होता है
कोई खुद ही नाराज़ होता है फिर खुद ही रोता है
अपनी ही हसरतों पे ये दिल टूट के बिखर जाता है
इस दर्द का मज़ा कभी तुम्हे जो मिले तो बताना
अपने आंसुओं पर भी रोता हूँ मैं और तेरे आंसुओं पर भी
ये दोहरी सज़ा कभी तुम्हे जो मिले तो बताना

Sunday, August 14, 2016
Topic(s) of this poem: love
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