तुम्हारे दम से महफूज़ हैं वतन वाले Poem by Ahatisham Alam

तुम्हारे दम से महफूज़ हैं वतन वाले

Rating: 5.0

कोई तन्हा है तेरे बिन कोई इंतज़ार करता है
कोई तुम बिन कुछ नही है कोई इतना प्यार करता है
ये कैसा फ़र्ज़ है तेरा की सबसे मुँह मोड़ आये हो
कोई रिश्ता निभाने को हर नाता तोड़ आये हो
कभी तपते सहरा में कभी सर्द वादी में
हिफाज़त मुल्क की करने हर आराम छोड़ आये हो
सियासत करने वाले तो सियासत ही करेंगे
जिन्हें हवस है गद्दी की वो हुकूमत ही करेंगे
तुम्हारे दम से ही महफूज़ हैं वतन वाले
जो समझेंगे वो तुमसे मोहब्बत ही करेंगे।

Sunday, August 14, 2016
Topic(s) of this poem: patriotic
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 August 2016

इस छोटी सी कविता के माध्यम से आपने देश के वर्तमान हालात का अच्छा वर्णन किया है. स्वार्थी राजनीतिज्ञों और वतन परस्त सैनिकों के अंतर खूबसूरती से समझाया है. बहुत बहुत धन्यवाद, मित्र ऐहतेशाम आलम जी.

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