ज़रा ये भी सोचो की क्या कर रहे हो Poem by Ahatisham Alam

ज़रा ये भी सोचो की क्या कर रहे हो

झुका इंसानियत का क्यूँ सर रहे हो
ज़हर नफरतों का जो यूँ भर रहे हो
इसी गुलिस्ताँ में तुमको रहना है आगे
ज़रा ये भी सोचो कि क्या कर रहे हो

बो गे जो तुम आज कल वही काटना है
नफरत की हर खाई को पाटना है
जिन्हें आज भी काँटे पसन्द हैं
उन्हें भी अब फूल बाँटना है ।

Sunday, August 14, 2016
Topic(s) of this poem: patriotic
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