हुई हैं जो क़ुर्बान मेरे मुल्क पर Poem by Ahatisham Alam

हुई हैं जो क़ुर्बान मेरे मुल्क पर

रगों का लहू अब तो जम ना सकेगा
ये अश्कों का सैलाब थम ना सकेगा
भले कर दो गर्दन को तन से जुदा
इस आलम का रुक ये क़लम न सकेगा
मैं दरिया की सारी रवानी लिखूँगा
मैं उल्फ़त की ऐसी कहानी लिखूँगा
हुई हैं जो क़ुर्बान मेरे मुल्क पर
मैं वो सारी जवानी लिखूँगा

Sunday, August 14, 2016
Topic(s) of this poem: patriotic
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success