ना जाने किस राह पे चल रहा हूँ मैं Poem by Ahatisham Alam

ना जाने किस राह पे चल रहा हूँ मैं

ना जाने किस राह पे चल रहा हूँ मैं
एक अजीब सी आग में जल रहा हूँ मैं

एक मुद्दत तक अंधेरों में बसकर
कोई उजाला कह रहा है ढल रहा हूँ मैं

कैसा दर्द है ये जो तड़पाता तो बहुत है
फिर भी इसे पाने को मचल रहा हूँ मैं

इस आलम के सीने में बहुत चुभन है आज
दिल पत्थर बनके कह रहा है पिघल रहा हूँ मैं।

Sunday, December 18, 2016
Topic(s) of this poem: love
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