ए ज़िन्दगी, एक बार जहां से… Poem by Priya Guru

ए ज़िन्दगी, एक बार जहां से…

ए ज़िन्दगी, तेरी इबादत करके देखूं
एक ओर बार जहां से, ए ज़िन्दगी!
तेरी हिफाज़त करके देखूं, एक ओर बार जहां से

दुआ मे सदा में ग़म मे रजा में
हरेक बार मोहताज़ किया यूंही
ए ज़िन्दगी
एक बार अमानत करके देखूं

याद रखता हूँ ज़माने की हरेक तस्वीर को
अमानत में खयानत करना हमको नहीं आता
बाद बरसो के आगाज़-ए-मोहब्बत होगा तुझसे
सच्चे ख़्वाबो में रंग भरना नहीं आता

सीख लूंगा मैं कल्मो से खेलना एक दिन
किसी ख़्वाब को छेड़ना पत्ती तोड़ना कुचलना सब
कहाँ कहीं सुना किसी ने राहों पे चलना किसी ने
मंज़िल ढूंढना कहीं फिर मिटाना किसी ने

ए ज़िन्दगी, तेरी इबादत करके देखूं
एक ओर बार जहां से, ए ज़िन्दगी!
तेरी हिफाज़त करके देखूं, एक ओर बार जहां से

- प्रिया गुरु, २८१२२०१६१

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