Dr. Navin Kumar Upadhyay


जब हसीन आसमाँ से, धरती उतर आते हैं - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

जब हसीन आसमाँ से, धरती उतर आते हैं,
धरा के लोग घेर, अचँभित खड़े हो जाते हैं।
जगमगा जाती रोशनी, मिट जाताअँधेरा पूरा,
कभी आसमाँ, कभी जमीं, देखते रह जाते हैं।।
चेहरे को देखें कि कोमल काले केश हम निहारें,
अधर अरुणिम हम देखें या मचलते नयन इशारे।
कोमल कपोल तकूँ या शुक सम नासिका नजरायें,
सब अँग-अँगन देख, खुद लुटते-लुटाते रह जाते है।।
उनकी बोलों को सुनूँ या देख लूँ बस उनको भर नजर,
हर एक अदा उनकी, दे दे रही, दिल को पूरी उम्दा कहर।
एक बार मिल जाये, बस एक बार, उनका कोमल करतल,
कितने कोमल सुन्दर सूकुमार, उनकी नजर, नजर आते हैं।।
बदन-अँग, सुरभित साँसें, समा जातीं हर ओर कहीं,
रुप-सौन्दर्य देख उनका, नयन-मन थकता नहीं कभी ।
सिर से पाँव, पाँव से सिर तक, बार-बार जाते हर नजर,
कहाँ, इक ठिकाने नजर लगाऊँ, सोचते रह जाते हैः।।
मन, जब कहीं इक मँजिल, तय नहीं कर पा सकता,
अँग-अँग, सारे बदन में ही लुटकर, अपने को मिटा जाता।
देख-देख नयन सुख सनकर, अपने को समाता इस कदर,
दिल बेताब बन, अँकवार भर, चूमने को मचल जाते हैं।।
ऊपर आसमाँ से देख रहे एकटक, चाँद सूरज भी पूरा नजारा,
कुछ तो कह पाते नहीं, न ही कुछ कर सकते भी इशारा ।
आसमाँ भी सहन न कर सकता, जुदाई में बन गया बेचारा,
घन-घटा रुप बन-गरज, 'नवीन' बादल बरस- दरश आते हैं।।

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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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