ऐसा निकला मेरा यार आज़माया हुआ Poem by Ahatisham Alam

ऐसा निकला मेरा यार आज़माया हुआ

सब कुछ लुटने के बाद अब हाथ खाली हैं
जो क़ासिम थे कभी वो अब सवाली हैं
वक़्त आज मुझको है कहाँ तक लाया हुआ
ऐसा निकला मेरा यार आज़माया हुआ।

कभी मेरे हक़ में कोई फैसला कर देना
समझ में आये तो मेरा भला कर देना
हमें अब भी सतातीं हैं वो यादें गुज़रे कल की
कोई था मेरा अपना जो जब पराया हुआ।
ऐसा निकला मेरा यार आज़माया हुआ।

Sunday, December 16, 2018
Topic(s) of this poem: love,poetry
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