तुम- हम Poem by Lalit Kaira

तुम- हम

क्या कहें और सुने क्या, चुप रहो, ना कुछ कहो
शब्द झूठे, स्वप्न झूठे, झूठे तुम और झूठे हम

मुझको लगती थी लगामें
कैसे कह दूं प्यार था वो
जिंदगी थी, मत कहो न
देह का व्यापार था वो

तब नहीं समझा किसी ने प्यार का अभिसार क्या
मार्ग छूटे, बंध टूटे, छूटे तुम और टूटे हम

जी सका हूँ तब से जितना
सच कहूँ तो प्यार है यह
पेड़ नदियां और बच्चे
(हां) अब सही श्रृंगार है यह

क्या गया और मिला क्या, गूढ़ उत्तर पा लिया अब
पीर समझाने लगी, क्यों रूठे तुम और रूठे हम

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Lalit Kaira

Lalit Kaira

Binta, India
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