आज उसे सोते देखा
जिसे हमेशा से पाँवों पे चलते देखता था
जिसे हर सुबह बस के पीछे दौड़ते देखता था
जिसे हर शाम महँगाई से हाथापाई करते देखता था
हर रविवार को बच्चों के दिन सवांरते देखता था
हर त्योहार को गरीबी से तकरार करते देखता था
जिसकी रफ्तार पर घड़ी की सुईयाँ मिलाया करता था
घिसी चप्पलों को रगड़ते देखता था
फटी साड़ी मे तन को समेटते देखता था
रोने को आँसू भी उधार माँगते देखता था
आज उसे रानी बनकर
फूलो से सजी पालकी पे
चार कांधो की सवारी करते देखा
जिसे कभी बैठे नहीं देखा था
आज उसे सोते देखा
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