Dr. Navin Kumar Upadhyay


मिलन की, मची मारा-मारी है - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

आज महफिल में न जाने की मेरी बारी है।
दिल में मगर मिलन की, मची मारा-मारी है।।
अँगड़ाईयाँ लेना छोड़ अब, जूते मचामच लो पहन।
हुस्न अपना दो दिखा, सामने कर दोअपना बदन।।
मीत मेरे, प्रीत भरकर, चार कर लो हमसे नयन।
अश्कों के अरमान समझ, स्वीकार करो मेरे नमन।।
दिल बेकाबू अब हो रहा, तुझे देखने की इँतजारी है।
दिल में अब मिलन की, हो रही मारा-मारी है।।
ख्वाबों में तो ख्याल मेरा, मगर चेहरे बन रहे अनजान ।
पर क्या चितवन से छिपती, है कभी दिल की दास्तान ।।
आँखें मिलते ही हो जाती, मिलने को बेताब- मदहोश ।
मिलन-उमँग के ज्वार उमड़कर, बदन बना देते बेहोश ।।
इसीलिए मेरे मन- तरँग में, मिलन- उमँग बहुत भारी है।
'नवीन' दिल मे मिलन की, मच गई मारा- मारी है।।

Topic(s) of this poem: love


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Poem Submitted: Tuesday, March 21, 2017



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