हर रात की खामोश चादर ओढ़ कर
कितनी आवाजें बेजुबान हो जाती है
हर रात के अंधेरे लिबास में लिपटकर
कितने सितम बेआबरू हो जाते हैं
हर रात के नशीले आग़ोश में ढलकर
कितने अरमान जवां हो जाते हैं
हर रात की बद्जुबान दरयाफ्तो में
कितनी गूंज खमोश हो जाती हैं
हर रात की तड़पती लौ की पुकार पर
कितने मजलिसें ख्वाम्खा हो जाती हैं
हर रात की खूबसूरत शीरीन पर
कितने फरहाद बेखौफ अंगारे फांद जाते हैं
हर रात की बेगुनाही पर
कितने मासूम गुनहगार हो जाते हैं
हर रात की रोशनी से बेवफाई पर
कितने आफताब पस्त हो जाते हैं
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