कितने आफताब पस्त हो जाते हैं Poem by Kezia Kezia

कितने आफताब पस्त हो जाते हैं

हर रात की खामोश चादर ओढ़ कर

कितनी आवाजें बेजुबान हो जाती है

हर रात के अंधेरे लिबास में लिपटकर

कितने सितम बेआबरू हो जाते हैं

हर रात के नशीले आग़ोश में ढलकर

कितने अरमान जवां हो जाते हैं

हर रात की बद्जुबान दरयाफ्तो में

कितनी गूंज खमोश हो जाती हैं

हर रात की तड़पती लौ की पुकार पर

कितने मजलिसें ख्वाम्खा हो जाती हैं

हर रात की खूबसूरत शीरीन पर

कितने फरहाद बेखौफ अंगारे फांद जाते हैं

हर रात की बेगुनाही पर

कितने मासूम गुनहगार हो जाते हैं

हर रात की रोशनी से बेवफाई पर

कितने आफताब पस्त हो जाते हैं

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Friday, March 31, 2017
Topic(s) of this poem: night
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