कहना नही, सुनना पड़ता है Poem by Kezia Kezia

कहना नही, सुनना पड़ता है

बहुत कुछ ऐसा होता है

जिसे शब्दों में पिरो नहीं पाता

इच्छा मन की मुख से कह नही पाता

शब्द बौने हो जाते हैं

कागज़ कोरे हो जाते हैं

भाषाओं के व्याकरण नगण्य हो जाते हैं

बहुत कुछ है जिसे कह्ने के लिये

उपमा और रुपक अलंकारों के

अस्त्र शस्त्र भी थोड़े पड़ जाते हैं

जिसे लिखने के लिये हर कलम

छोटी हो जाती है

कलम उठाते ही

दवात की स्याही सूख जाती है

बहुत कुछ है जिसे

मन को मुख तक लाने में

सदियाँ बीत जाती हैं

और जिसे ना कह्ने मे

मन की शान्ति छिन जाती हैं

बहुत कुछ है ऐसा ही

जिसे कहना नही

सिर्फ सुनना पड़ता है

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Friday, March 31, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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