तितली और फूल Poem by Kezia Kezia

तितली और फूल

एक रंग बिरंगी तितली

उड़ी जा रही थी

हवा के संग बही जा रही थी

कौन जाने कहाँ जा रही थी

बस में बैठे यूँ ही नज़र पड़ी

सड़क के बीच में फँस कर

इधर से उधर, उधर से इधर

चक्कर लगाती

नाजुक पंखों वाली

भोली भाली सी न्यारि तितली

थोड़ी देर के खेल के बाद

पहुँच गयी चौराहे के पास

होर्डिंग पे बने फूलो को देख चकराई

नकली फूलो से जा टकराई

समझ नही पाई

ये नकली फूल हैं,

ना खुशबू है ना रस है इनमें

एक छलावा मात्र है इनमें

फिर भी टकरा टकरा कर

उन फूलों से

उसने अपनी जान गँवाई

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Saturday, April 1, 2017
Topic(s) of this poem: nature
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