एक रंग बिरंगी तितली
उड़ी जा रही थी
हवा के संग बही जा रही थी
कौन जाने कहाँ जा रही थी
बस में बैठे यूँ ही नज़र पड़ी
सड़क के बीच में फँस कर
इधर से उधर, उधर से इधर
चक्कर लगाती
नाजुक पंखों वाली
भोली भाली सी न्यारि तितली
थोड़ी देर के खेल के बाद
पहुँच गयी चौराहे के पास
होर्डिंग पे बने फूलो को देख चकराई
नकली फूलो से जा टकराई
समझ नही पाई
ये नकली फूल हैं,
ना खुशबू है ना रस है इनमें
एक छलावा मात्र है इनमें
फिर भी टकरा टकरा कर
उन फूलों से
उसने अपनी जान गँवाई
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