जी चाहे बच्चा बन जाऊं Poem by Kezia Kezia

जी चाहे बच्चा बन जाऊं

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जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

माँ का आँचल, पिता की अंगुली पा जाऊं

दादी की लोरी दादा की कहानी सुन पाऊँ

जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

अपनी हर मनमानी पर

फिर से उधम मचाऊं

तहजीब और सलीका भूल

जीवन फिर से जी पाऊँ

जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

गुड्डे गुड़िया, वही खेल खिलोने वापस लाकर

खेलूं और सबको खिलाऊं

नखरे करके रूठने पर

पिता की फटकार

माँ का दुलार पा जाऊं

जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

अपना छोटा सा संसार वही

फिर से पा जाऊं

कंकड़और पत्थर की दौलत,

नकली जहाज और नाव से

एक बार फिर बादशाह बन जाऊं

जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

तमीज़दार की पदवी ठुकरा कर

एक बार फिर नासमझ बन जाऊं

जी चाहे जब रो पाऊँ जी चाहे खुलकर हंस पाऊँ

जी चाहे फिर से बच्चा बन जाऊं

कोई शिकायत हो जग से

या चोट लगे तो झट से

माँ की गोदी पा जाऊं,

पिता के कंधे पा जाऊं

जी चाहे एक बार फिर से बच्चा बन जाऊं

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Saturday, April 1, 2017
Topic(s) of this poem: childhood,memories
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