तेरा मिलना Poem by Kezia Kezia

तेरा मिलना

तेरा मिलना इत्तेफाक़ था

शायद बिछड़ना भी इत्तेफाक़ था

एक आँधी का इसमें नजारा था

चुपचाप जो गुज़र गयी

वो भी तो एक इशारा था

काँटों के चमन मे फूलो का निशान न था

पर तुम्हारी मौजूदगी से वो समा भी बड़ा सुहाना था

वीरानगी की बानगी तो तुम साथ ही लाये

फिर दोष क्योँ तक़दीर पर मढ़ते रहे

इस ओर तनहाई के काफिले को मोड़ते हुए

हर बार दूर ही दूर जाते रहे

टूटे हुये तारे की तरह आये

ना रौशन हुई ना जगमग हुई जिंदगी

आँखों से सपने और नींदें खाली कर गये

ना खतम होने वाली आँसुओं की बरसाते दे गये

तेरा मिलना शायद इत्तेफाक़ था

और बिछड़ना भी इत्तेफाक़ ही था

जो सीखा गया एक ऐसा सबब

जो जिंदगी भर नही सीख पाती

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