तेरा मिलना इत्तेफाक़ था
शायद बिछड़ना भी इत्तेफाक़ था
एक आँधी का इसमें नजारा था
चुपचाप जो गुज़र गयी
वो भी तो एक इशारा था
काँटों के चमन मे फूलो का निशान न था
पर तुम्हारी मौजूदगी से वो समा भी बड़ा सुहाना था
वीरानगी की बानगी तो तुम साथ ही लाये
फिर दोष क्योँ तक़दीर पर मढ़ते रहे
इस ओर तनहाई के काफिले को मोड़ते हुए
हर बार दूर ही दूर जाते रहे
टूटे हुये तारे की तरह आये
ना रौशन हुई ना जगमग हुई जिंदगी
आँखों से सपने और नींदें खाली कर गये
ना खतम होने वाली आँसुओं की बरसाते दे गये
तेरा मिलना शायद इत्तेफाक़ था
और बिछड़ना भी इत्तेफाक़ ही था
जो सीखा गया एक ऐसा सबब
जो जिंदगी भर नही सीख पाती
***********
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem