इन किताब मे लिखे शब्द आज मूक हो गये
मुझसे बतियाते बतियाते सारे सो गये
एक फर्जी रिश्ता गढ़ लिया था मुझसे
उसको निभाते निभाते बेचारे खो गये
ये शब्द जिनके मायने तलाशने मे
हर दिन दिमाग के घोड़ों को दौड़ाती थीं
ये शब्द जिनसे हँसती और गुर्राती थीं
मुझे आवाज देकर खुद चुप हो गये
किताबो मे लिखे ये शब्द,
यहाँ वहाँ उड़कर चले जाते थे
तो पकड़ने को छलांग लगाती थीं
पीड़ा और दास्तां को इनसे ही सजाती थी
ये शब्द आज क्यों खामोश हो गये
मुझे चेतना देते देते
ये सारे, अवचेतन हो गये
बात जो है इनके मन मे कहते नही
मैं बोलती हूँ तो भी ये सुनते नही
बात सुनकर इधर उधर उड़ा देते हैं
बिन बात के जाने क्यों मुझे सजा देते हैं
ये किताबों मे बसे शब्द
आज क्यों गूंगे और बहरे हो गये
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