गूंगे बहरे शब्द Poem by Kezia Kezia

गूंगे बहरे शब्द

इन किताब मे लिखे शब्द आज मूक हो गये

मुझसे बतियाते बतियाते सारे सो गये

एक फर्जी रिश्ता गढ़ लिया था मुझसे

उसको निभाते निभाते बेचारे खो गये

ये शब्द जिनके मायने तलाशने मे

हर दिन दिमाग के घोड़ों को दौड़ाती थीं

ये शब्द जिनसे हँसती और गुर्राती थीं

मुझे आवाज देकर खुद चुप हो गये

किताबो मे लिखे ये शब्द,

यहाँ वहाँ उड़कर चले जाते थे

तो पकड़ने को छलांग लगाती थीं

पीड़ा और दास्तां को इनसे ही सजाती थी

ये शब्द आज क्यों खामोश हो गये

मुझे चेतना देते देते

ये सारे, अवचेतन हो गये

बात जो है इनके मन मे कहते नही

मैं बोलती हूँ तो भी ये सुनते नही

बात सुनकर इधर उधर उड़ा देते हैं

बिन बात के जाने क्यों मुझे सजा देते हैं

ये किताबों मे बसे शब्द

आज क्यों गूंगे और बहरे हो गये

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Monday, April 3, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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