सार्वभौमिक सार Poem by Kezia Kezia

सार्वभौमिक सार

कुछ शब्दों का भावनात्मक प्रवाह है

समस्त भावों का एकात्मक संचार है

कविता इस तंत्र का सार्वभौमिक सार है

प्रण प्रक्षेपण का आधार है

जीवन संचरण का विस्तार है

बूंदो के समागम का उपचार है

कविता मे निहित निर्वहन का सार है

कुछ कहना या सुनना मात्र नही

अनुशीलन का इसमें व्यवहार है

दुर्लभ संयोगों की भरमार है

समंवय से जुड़ी वेदना का विचार है

कविता इस तंत्र का समायोजित आचार है

विषय लिप्त आराधना का मूलाधर है

परमेश्वर की अनदेखी प्रतिमा का प्रतिष्ठान है

हरि चरण वंदना का विस्तृत संवाद है

कविता इस तंत्र का दुर्लभ अनुराग है

शील जनित रस का श्रिंगार है

शून्य मे प्रवाहित उल्लास का एकाग्रित उद्गार है

क्षणिक त्रुटियों का स्वभाविक अहंकार है

मानवीय गुणों के तप्त वैभव का प्रचार प्रसार है

कुछ भावों का भावनात्मक प्रवाह है

कविता इस तंत्र का सार्वभौमिक सार है

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Tuesday, April 4, 2017
Topic(s) of this poem: poem
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