दिलों से मैं नफरत मिटा के रहूँगा। Poem by Ahatisham Alam

दिलों से मैं नफरत मिटा के रहूँगा।

दिलों से ये नफरत मिटा के रहूँगा
चरागे मोहब्बत जला के रहूँगा
सियासत की आड़ में जो ज़हर बो रहे हैं
नक़ाब उनके चेहरे से हटा के रहूँगा

वो मग़रूर है जो ताक़त पे अपनी
तो मैं उसकी हस्ती मिटा के रहूँगा
ये जाँ और जिस्म सब तेरे नाम ऐ मुल्क
तुझी पर ये सबकुछ लुटा के रहूँगा

सियासत से मुझको नही वास्ता अब
अलग ही चुना है नया रास्ता अब
ये सैलाब मेरा रुक ना सकेगा
हुकूमत की चूलें हिला के रहूँगा

ये हिन्दू ये मुस्लिम लड़ाओगे कब तक
ये मंदिर ये मस्जिद बताओगे कब तक
ऐ महलों के मालिक बताओ ज़रा तुम
ग़रीबों के घर ये जलाओगे कब तक
दिलों से मैं नफरत मिटा के रहूँगा
चरागे मोहब्बत जला के रहूँगा।

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