बैठा था
शांत भाव से
अंधेरा घिर आया था
कमरे में बत्ती जलाई
तुरंत परछाई सामने आई
मेरी ही परछाई
एक मैं और एक मेरी परछाई
अलग अलग दिशाओं में
उजाले की विपरीत दिशा में
मुझे खींच रही थीं
वो उजाले से डरी हुई थी
अंधेरे मे कभी सामना नहीं
जैसे ही उजाला होता
मुझसे एक कदम पीछे जाकर
मुझे पुकारती है
मैं स्थिर वो भी स्थिर
मेरे गति करते ही
फिर खींचातानी शुरु
दिशा में जा रही थीं
थककर बत्ती बुझा दी
और अजादी पा ली
अपनी परछाई से
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