मैं और मेरी परछाई Poem by Kezia Kezia

मैं और मेरी परछाई

बैठा था

शांत भाव से

अंधेरा घिर आया था

कमरे में बत्ती जलाई

तुरंत परछाई सामने आई

मेरी ही परछाई

एक मैं और एक मेरी परछाई

अलग अलग दिशाओं में

उजाले की विपरीत दिशा में

मुझे खींच रही थीं

वो उजाले से डरी हुई थी

अंधेरे मे कभी सामना नहीं

जैसे ही उजाला होता

मुझसे एक कदम पीछे जाकर

मुझे पुकारती है

मैं स्थिर वो भी स्थिर

मेरे गति करते ही

फिर खींचातानी शुरु

दिशा में जा रही थीं

थककर बत्ती बुझा दी

और अजादी पा ली

अपनी परछाई से

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Saturday, April 15, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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