दहलीज पर बैठी थी Poem by Kezia Kezia

दहलीज पर बैठी थी

दहलीज पर बैठी थी

कुछ रोशनी बाहर, कुछ भीतर थी

धीरे धीरे साँझ को रात मे

बदलते देख रही थी

मन मे रात और

बाहर सांझ थी

सूरज को ढलकर चांद मे

बदलते देख रही थी

कुछ रोशनी बाहर, कुछ भीतर थी

मर्यादा की सीमा सधी थी

पार ना करने की गरिमा मे बंधी थी

इस दहलीज में पल रही थी

बाहर निकलने को मचल रही थी

बाहर की साँझ और

भीतर की रात निरंतर छल रही थीं

विकराल आवरण मे स्वयम्‌ को बंदिनी और

रात को पहरेदार समझ रही थी

दहलीज पर बैठी थी

कुछ रोशनी बाहर कुछ भीतर थी

*****

Saturday, April 15, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success