ठूँठ था नहीं, ठूँठ बन गया Poem by Kezia Kezia

ठूँठ था नहीं, ठूँठ बन गया

वो झाड़ बरसों से यूँ ही खड़ा था

ठूँठ बन धरती पर पड़ा था

ना शाख थे ना पात

झेल रहा था सामाजिक आघात

उस वन में हरे भरे पेड़ों के बीच

खड़ा था बनकर मौन आंखें मींच

सबकी बातें सुनता था

अपनी कभी ना कहता था

वाद संवाद कैसे करे

अपनी गोद में पाले कितने पौधे

आज उनको कैसे

छोड़ कर आगे बढ़े

गति चेतना जाने लगे

अपने से पौधे भी आंखे चुराने लगे

वो ठूँठ आज आंखें भरकर

कहने लगा

व्यथा अपनी मुझे सुनाने लगा

मेरा भी आशियाना हरा भरा था

मुझ पर पँछियों का बसेरा था

एक दिन कुछ पौधों और लताओ ने

आश्रय मांग लिया

मैंने अपना सा जानकर

हाँ मे सिर हिला दिया

उन्होनें मुझे छल लिया

आश्रय के साथ साथ

मुझसे सब छीन लिया

आज उन्ही के बीच लाचार हो खड़ा हूँ

ठूँठ था नहीं, ठूँठ बन गया हूँ

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Saturday, April 22, 2017
Topic(s) of this poem: nature,philosophical
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