कठपुतली ने धागे तोड़ डाले Poem by Kezia Kezia

कठपुतली ने धागे तोड़ डाले

कठपुतली ने धागे तोड़ डाले

आज वो भी उड़ने लगी

उड़ने लगी उस असीम आसमान में

जिसके सपने सदियों से देखा करती थी

डोरों में बिंधे परों को

उड़ने लायक बना लिया

डोर में बंधे पर उकता गये थे

आज कठपुतली ने भी मन चाही

छलांग लगा ही ली

कतर दिया उन धागों को

जो औरो के हाथों में थामे जाते थे

लाचारी मे नाचती थी

उन धागों के खिंचाव की वेदना से

मूक बन कर कितनी सदियाँ

बिता दी

आज वो धागे तोड़ कर बिखरा दिये

आसमान में तारों की तरह

और फुदकने लगी

बेबाकी से आज

बिना धागों वाली कठपुतली

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Saturday, April 29, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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