कठपुतली ने धागे तोड़ डाले
आज वो भी उड़ने लगी
उड़ने लगी उस असीम आसमान में
जिसके सपने सदियों से देखा करती थी
डोरों में बिंधे परों को
उड़ने लायक बना लिया
डोर में बंधे पर उकता गये थे
आज कठपुतली ने भी मन चाही
छलांग लगा ही ली
कतर दिया उन धागों को
जो औरो के हाथों में थामे जाते थे
लाचारी मे नाचती थी
उन धागों के खिंचाव की वेदना से
मूक बन कर कितनी सदियाँ
बिता दी
आज वो धागे तोड़ कर बिखरा दिये
आसमान में तारों की तरह
और फुदकने लगी
बेबाकी से आज
बिना धागों वाली कठपुतली
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