बेवजह Poem by Kezia Kezia

बेवजह

बेवजह मैं तुमसे नाराज हो गयी

बेवजह तुम मुझसे खफा हो गये

बेवजह जिंदगी हम पर तोहमत

लगाती चली गई

बेवजह किनारों तक आकर

लहरें मोह्ब्बत की छूटती चली गईं

बेवजह फानी वजहों को तलाशते रह गये

बेवजह जिंदगी के हसीन गुलिस्ताँ को

संजीदगी का सहरा बनाते चले गये

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Sunday, April 30, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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