तुम कितने करीने से सजाया करती थी
जिंदगी की अलमारी को
मैं बेबाकी से उधम मचा कर
सब बिखरा दिया करता था
तुम हर खुशी को सजा कर
ग़मों को रद्दी की तरह निकाल कर
बाहर फेंक दिया करती थी
हर खाने को तराश कर
प्यार की तह जमा दिया करती थी
कभी कभी मैं उसमें एकाध छीटें
अहम के मिला दिया करता था
तब तुम बड़े अदब से
बिना शिकवे और शिकायत के
उन छीटो को अपनी मोहब्बत के
दरिया में बहा दिया करती थी
कितनी तरतीबी से तुम दायरो को
खींचा करती थी
जिनसे चाहकर भी बाहर
निकल नही पाता था
तुम मेरी हर आरजू को
दायरो की हदों तब निभाती थी
आज उन हदों से बाहर आकर
एक बार फिर वही दायरे पाना चाहता हूँ
कितने करीने से तुम सजाया करती थी
मेरी जिंदगी की अलमारी
आज तुम्हे एक बार फिर ढूँढता हूँ
वो बेबाक उधम मचाने का
हौसला एक बार फिर से पाना चाहता हूँ
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