मातम Poem by Kezia Kezia

मातम

वो मरा, हाय
मातम सबने किया
वो मर गई, हाय
मातमी हर कोई बना
कोई बड़ा हुआ ईश्वर को प्यारा
कोई फंदे से झूल गया
कोई जहर खा सो गया
कोई चली गयी गुड़िया तड़प कर
कोई बना निशाना हथियार का
मातम सबने किया
क्यों ना करें
इंसानियत के नाते
मौत पर मातम होता है
बहता है लहू आंखो से
पीटते हैं छाती दुखों से
पर उन मृत्युओं पर
कहां होता है मातम
जब भावनाये कुचली जाती हैं
जब दरिंदगी माथे पर सवार होती है
जब चीरहरण होता द्रौपदियों का
जब मृत्यु के मुँह मे समा जाती है
दुर्जनों की इंसानियत
मर जाती है आंते बिना रोटी के
कितने मासूम बालकों की
नही होता मातम ऐसी
अनदेखी मृत्युओं पर
ये कहां मृत्यु से कम दर्द्नाक होते हैं
जब सांस अटकी रहती है
और बार बार मृत्यु को पुकरती है
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Thursday, May 4, 2017
Topic(s) of this poem: death
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