हर श्रद्धा से जुड़ा होता है एक नाम
किसी के लिए रहीम, किसी के लिए राम
बरक़रार क्यों नहीं रखते एक तालमेल
बढ़ाता जाये जो सबमे मेल
बदलती है दुनिया बदल जाते हैं हालात
रह जाती है नफरते और नफरतों की सौगात
कुछ खींची गई लकीरों के जुड़ाव
भर जाते हैं मन में अलगाव
उसकी इनायत ने दी हैं जहाँ भर की खुशियां
फिर क्यों इंसान करता है इतनी दुशवारियाँ
सबकी नसों में बहते लहू का रंग एक
फिर नियत इंसान की क्यों नहीं नेक
इस जलजले को उठाने का सबब क्या है
इतने दिलों की हाय लेने का मलाल क्या है
श्रद्धा नहीं कहती हर दिन एक तूफान उठाना
मजार और मंदिर पे फूल चढ़ाना
अमन का पैगाम हर आँगन में पहुचाना
गुजारिश इतनी सी है कि
श्रद्धा के नाम पर लहू मत बहाना
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