रिश्तों मे विशेषण Poem by Kezia Kezia

रिश्तों मे विशेषण

Rating: 4.3

ना ऊँचाई, ना गहराई
शायद हम जान ही ना पाये
रिश्तों की छुअन का अह्सास
धुमिल सा हर पल हमें लगा
याद नहीं कोइ पल जब
उदास हुए हों किसी के लिये हम
तुम कह्ते हो तुमने हमे ही देखा ख्वाबों मे
हमे तो तुम्हारी सूरत भी नही पता
तुम कह्ते हो हमीं ने तुम्हे सुहाना बनाया
शायद बहक गये हैं तुम्हारे ये हंसी खयाल
कि बस तुम्हे हमारा ही है खयाल
रिश्ता कोई भी नही, कहीं भी नही
कैसी भी नही है नरमी
फिर क्यों है सांसो मे तुम्हारी चहलकदमी
ना जाने तुम कहाँ हो
ना जाने मैं कहाँ हूँ
दोनों दो किनारे हों शायद दरिया के
फिर क्यों कहते हो
हम कभी मिले थे
क्यों लगता है तुम्हे कि
मैं कुछ कहती हूँ तुम्हारे कानो में
सोचती हूँ तुम्ही को
नही मैं तुम्हे नही जानती क्योंकि
ना ऊँचाई ना गहराई
रिश्तों मे ये विशेषण सूझे ही नही
शायद तुम ख्वाब हो
या खयाल हो
नही तो कुछ भी नही, मेरा भ्रम हो
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COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 07 May 2017

नीहारिकाओं की तरह ही रिश्तों का निर्माण भी भावना रुपी गैसों के घनीभूत होने का ही परिणाम होता है. रिश्तों के शुरूआती दौर में शंकाओं और असमंजस से सामना होना सामान्य प्रक्रिया का ही भाग है. मेरे ख्याल से कविता में इस स्थिति का सुंदर चित्रण है. रिश्ता कोई भी नही, कहीं भी नही कैसी भी नही है नरमी.... फिर क्यों है सांसो मे तुम्हारी चहलकदमी शायद तुम ख्वाब हो.... या खयाल हो.... नही तो कुछ भी नही, मेरा भ्रम हो

2 0 Reply
Kezia Kezia 08 May 2017

कविता से कही अधिक सुंदर ये टिप्पणी है. इतनी सुंदर टिप्पणी के लिये अति धन्यवाद श्रीमान.

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