नन्ही चिड़िया Poem by Kezia Kezia

नन्ही चिड़िया

वो देख रही है काली काली आँखों से मुझे
सिहर गयी अचानक छोटे से घोसले मे,
मेरी अनुपस्थिति में अपनी नन्ही चिड़िया
के लिये जो बनाया था
उसके लाल काले छोटे छोटे पँख बहुत सुंदर थे
हर घड़ी हर क्षण मुझ पर ही नज़र रखती थी
मैं उसकी दुश्मन हो गयी थी
उसका घोसला खिड़की मे
लगी जाली के बाहर था
खिड़की के पास जाते ही मुझ पर टूट पड़ेगी
हमले की सोचती होगी
हाँ वो बेहद नाजुक चिड़िया
मुझ पर हमले की सोचती होगी
अपने नन्हे बच्चे को बचाने के लिये
मैं खिड़की के पर्दे को लगाने सोचती हूँ
मंद मुस्कान मुझे रोक देती है
उस ओर जाने से
मेरे हाथो को अपनी ओर आते
देख चोकन्नि हो जाएगी, डर जाएगी
मैं अपना इरादा बदल देती हूँ
वो अपने नन्हे से पक्षी के पास
हर समय पहरे बैठी रहती थी
एक सुबह, चीं चीं के शोर से नींद टूटी
एक बेहद नाजुक नन्हे पंखों वाला पक्षी
उस घोसले मे फुदक रहा है
कुछ देर बाद घोसला खाली था
वो नन्हा पक्षी आज उड़ना सीख चुका था
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