यादें Poem by Kezia Kezia

यादें

यादें हज़ारो इस जहन में हैं

कहती कुछ नहीं पर बेजुबान हो बसी खड़ी हैं

जहन के दरवाजे पर लिख दिया है

किसी और याद का अब यहाँ आना गुनाह है

खौफ तो है नहीं मगर सदियों की परंपरा है

और यादों से पुराना रिश्ता निभाना है

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Tuesday, May 9, 2017
Topic(s) of this poem: memories
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