जीने का सबब Poem by Kezia Kezia

जीने का सबब

उस सड़क से रोज गुजरती हूँ
देखती हूँ उन न थकने वाले क़दमों को
जो इतने रस्ते तय करके भी चलते जाते है
जो होसला रखते हैं मंजिल तलाशने का हर रोज
पहुँच जाते हैं कहीं भी मंजिल बुलाती है जहाँ
हौसलों के परों पर ही कदम उठते जाते हैं
रोज देखती हूँ उन चिर परिचित चेहरों को
कुछ खुशगवार, कुछ हताश निराश चेहरों को
जिन्दगी के चौराहे पर फसते नहीं हैं
ढूँढ ही लेते हैं अपने दरो दीवार को
पहुच कर खो नहीं जाते घरोंदो में
अगले दिन फिर उसी चौराहे को
फांदने निकल पड़ते हैं
उस सड़क से गुजरते हुए
देखती हूँ उन बुत बने विशाल पेड़ों को
जो गवाह बने हैं हर दिन की तलाश के
खड़े रहते हैं दोस्त बनकर हर धूप और छांवों में
कभी मुरझाने का ग़म नहीं करते
कभी हरियाली का गुमान नहीं जताते
उस सड़क से गुजरते हुए
परिंदों की कतारों को आते जाते देखती हूँ
पा जाती हूँ मैं भी मकसद
हर शाम की सुबह तो जरूर होती है
रुकते नहीं हैं रास्ते, मिल जाते हैं
कहीं ना कहीं किसी मोड़ पर फिर से
उस सड़क से गुजरते हुए
हर दिन जिन्दगी जीने का
एक नया सबब तलाश ही लेती हूँ
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Saturday, May 13, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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