कभी कभी कुछ आधे अधूरे से किस्से
जाने क्यों यूँ ही बन जाते हैं जीवन के हिस्से
कितने ही पन्नों को को भर जाते हैं और
जीने का सबब दे जाते हैं ये आधे अधूरे से किस्से
इनको जोड़तोड़कर देखने का वक़्त भी
पन्ने पलटने में ही बीत जाता है
पलटने पर अतीत में पहुँचने का झरोखा बन जाते हैं
ये आधे अधूरे से किस्से कभी कभी खूब याद आते हैं
होठों पर मुस्कान और आंखों में पानी दे दे जाते हैं
यूँही कभी कभी लगते ये किस्से
टूटे हुए आधे चाँद के हिस्से
अधूरे किस्से, अधूरे ख्वाबों को बयां करते हैं
जीने की धूमिल हुई चाह को फिर से आबाद करते हैं
अधूरे किस्से, अधूरे रिश्तों की याद दिलाते हैं
उनमे पड़ी दरार को भरने की कोशिश करते हैं
खुशियों की एक अधूरी तस्वीर को छोड़ कर चले जाते हैं
ये आधे अधूरे से किस्से जाने क्यों
मन को बहुत याद आते हैं
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क्या बात है! ! अच्छा कहा है. मेरा भी ऐसा मानना है कि जीवन में इसी प्रकार के पथचिन्हों को पहचानना पड़ता है और अपना रास्ता तय करना पड़ता है. बहुत बहुत धन्यवाद. कभी कभी कुछ आधे अधूरे से किस्से जाने क्यों यूँ ही बन जाते हैं जीवन के हिस्से जीने की धूमिल हुई चाह को फिर से आबाद करते हैं
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bhot khub.......adhe adhure kisse