यादों के जुगनू Poem by Kezia Kezia

यादों के जुगनू

तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
वक्त की मुट्ठी में जकड़ना चाहा
पर वो नज़रों से ओझल होते रहे
चाँद तारों की भरमार थी
फिर भी मुझे वो ही सुहाते रहे
हम तो बस यादों के गहरे समंदर में गोते लगाते रहे
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
सवालों की लड़ी तुम पिरो कर लाये
उसमे जवाबों के मोती ढूँढ़ते रहे
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
चलने की इतनी रफ़्तार थी तेरी
पा न सके साथ उस रफ़्तार पे तेरी
हर आहट पे सांस मेरी थमती रही
उजाला कोई भी देख आँखे ये चमकती रही
वक़्त बेवक्त चाँद की चांदनी भी मद्दम मद्दम होती रही
हवा से भी खुशबू की तरह आवाजे तेरी आती रहीं
तेरी यादो के जुगनुओं पर कहर दर कहर बरसाती रही
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
वक्त की मुट्ठी में जकड़ना चाहा
पर वो नज़रों से ओझल होते रहे
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Sunday, May 14, 2017
Topic(s) of this poem: love,memories
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 May 2017

तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे हवा से भी खुशबू की तरह आवाजे तेरी आती रहीं तेरी यादो के जुगनुओं पर कहर दर कहर बरसाती रही....// सुंदर उपमाओं और अभिव्यक्ति वाली कविता. यहाँ कुछ अस्पष्टता है. खुशबू की तरह उसकी आवाज़ें आती रही और उसकी ही यादों के जुगनुओं पर कहर बरसाती रहीं अर्थात् खुशबू की तरह उसकी आवाज़ें और उसकी यादों के जुगनू दोनों ही सुखद अहसास देते हैं. दोनों एक दूसरे का विरोध या एक दूसरे को नुक्सान कैसे पहुंचा सकते हैं?

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