तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
वक्त की मुट्ठी में जकड़ना चाहा
पर वो नज़रों से ओझल होते रहे
चाँद तारों की भरमार थी
फिर भी मुझे वो ही सुहाते रहे
हम तो बस यादों के गहरे समंदर में गोते लगाते रहे
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
सवालों की लड़ी तुम पिरो कर लाये
उसमे जवाबों के मोती ढूँढ़ते रहे
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
चलने की इतनी रफ़्तार थी तेरी
पा न सके साथ उस रफ़्तार पे तेरी
हर आहट पे सांस मेरी थमती रही
उजाला कोई भी देख आँखे ये चमकती रही
वक़्त बेवक्त चाँद की चांदनी भी मद्दम मद्दम होती रही
हवा से भी खुशबू की तरह आवाजे तेरी आती रहीं
तेरी यादो के जुगनुओं पर कहर दर कहर बरसाती रही
तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे
वक्त की मुट्ठी में जकड़ना चाहा
पर वो नज़रों से ओझल होते रहे
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तेरी यादों के जुगनू रात भर टिमटिमाते रहे हवा से भी खुशबू की तरह आवाजे तेरी आती रहीं तेरी यादो के जुगनुओं पर कहर दर कहर बरसाती रही....// सुंदर उपमाओं और अभिव्यक्ति वाली कविता. यहाँ कुछ अस्पष्टता है. खुशबू की तरह उसकी आवाज़ें आती रही और उसकी ही यादों के जुगनुओं पर कहर बरसाती रहीं अर्थात् खुशबू की तरह उसकी आवाज़ें और उसकी यादों के जुगनू दोनों ही सुखद अहसास देते हैं. दोनों एक दूसरे का विरोध या एक दूसरे को नुक्सान कैसे पहुंचा सकते हैं?