विरोधाभास Poem by Kezia Kezia

विरोधाभास

आईने में झांकता हूँ

कितने विरोधाभास देखता हूँ

सागर की गहराइयों में

कितने मोती और रत्नों को ढूंढता हूँ

सुन्दर सब चीज़े दिखती हैं

सब कुछ चमकता और ख़ूबसूरत देखता हूँ

पीछे छुपा हर भाव समझता हूँ

शून्य से चंचलता तक

सब हाव भाव परखता हूँ

छूने को हाथ बढ़ाता हूँ

छाया ही होती है

ठिठक कर पीछे हो लेता हूँ

आईने में एक चिर परिचित छवि

फिर जी उठती है

कितनी किरणे फूटती है

कुछ और नहीं सोचता हूँ

विरोधाभास ही देखता हूँ

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Friday, May 19, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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