आईने में झांकता हूँ
कितने विरोधाभास देखता हूँ
सागर की गहराइयों में
कितने मोती और रत्नों को ढूंढता हूँ
सुन्दर सब चीज़े दिखती हैं
सब कुछ चमकता और ख़ूबसूरत देखता हूँ
पीछे छुपा हर भाव समझता हूँ
शून्य से चंचलता तक
सब हाव भाव परखता हूँ
छूने को हाथ बढ़ाता हूँ
छाया ही होती है
ठिठक कर पीछे हो लेता हूँ
आईने में एक चिर परिचित छवि
फिर जी उठती है
कितनी किरणे फूटती है
कुछ और नहीं सोचता हूँ
विरोधाभास ही देखता हूँ
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