वही ख्वाब रोज देखती हूँ
उड़ते परिंदों को क्षितिज की ओर
जाते हुए देखती हूँ
उनसे क्षितिज का पता पूछती हूँ
हर कली को सुबह सवेरे
खिलकर महकते देखती हूँ
उनसे उनकी खुशी का ठिकाना पूछती हूँ
चांद, तारों और नक्षत्रों को आसमान का
फेरा लगाते देखती हूँ
उनसे निरंतर गति का राज़ पूछती हूँ
बादलों से अलग होती बूँदों में भीगती हूँ
उनकी जुदाई की वजह पूछती हूँ
सागर की लहरों को किनारे छू कर
भागते देखती हूँ
उनसे खेल में जीत कर हारने का
कारण पूछती हूँ
औस की बूंदो को हर सुबह सतरंगी छटा
बिखरा कर गुम होते देखती हूँ
उनसे गुम हो कर फिर आने का कारण पूछती हू
सूरज को दिनभर चमक कर हर शाम
आसमान छोड़ते देखती हूँ
उससे उसका ठिकाना पूछती हूँ
मिट्टी में घुली बूंदो की सौंधी महक लेती हूँ
वही ख्वाब हर रोज़ देखती हूँ
वही सवाल फिर दोहराती हूँ
और खो जाती हूँ
अपने ही दिन और रात में
*****
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem