वही ख्वाब रोज देखती हूँ Poem by Kezia Kezia

वही ख्वाब रोज देखती हूँ

वही ख्वाब रोज देखती हूँ

उड़ते परिंदों को क्षितिज की ओर

जाते हुए देखती हूँ

उनसे क्षितिज का पता पूछती हूँ

हर कली को सुबह सवेरे

खिलकर महकते देखती हूँ

उनसे उनकी खुशी का ठिकाना पूछती हूँ

चांद, तारों और नक्षत्रों को आसमान का

फेरा लगाते देखती हूँ

उनसे निरंतर गति का राज़ पूछती हूँ

बादलों से अलग होती बूँदों में भीगती हूँ

उनकी जुदाई की वजह पूछती हूँ

सागर की लहरों को किनारे छू कर

भागते देखती हूँ

उनसे खेल में जीत कर हारने का

कारण पूछती हूँ

औस की बूंदो को हर सुबह सतरंगी छटा

बिखरा कर गुम होते देखती हूँ

उनसे गुम हो कर फिर आने का कारण पूछती हू

सूरज को दिनभर चमक कर हर शाम

आसमान छोड़ते देखती हूँ

उससे उसका ठिकाना पूछती हूँ

मिट्‍टी में घुली बूंदो की सौंधी महक लेती हूँ

वही ख्वाब हर रोज़ देखती हूँ

वही सवाल फिर दोहराती हूँ

और खो जाती हूँ

अपने ही दिन और रात में

*****

Friday, May 19, 2017
Topic(s) of this poem: dream
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success