चलो ये रास्ता दोनों मिलकर पार करते हैं
खुद रूठ कर खुद ही मान जाते हैं
एक दूसरे की चाहतों को जान कर
पूरा करने के लिये दुख सुख दाव पर लगाते है
चलो उस चमकते चांद से
थोड़ी सी चाँदनी उधार माँगते हैं
मुद्दतों बाद मिली फुरसत में
बातें दो चार करते हैं
इस ठंडी गीली रेत पर धीमे धीमे से
पांव के निशान छोड़कर चलते हैं
एक दूसरे का हाथ थामकर
ग़मों को पराया कर चलते हैं
वक़्त की तितलियों को अब
बंद मुट्ठी से आज़ाद कर चलते हैं
खुद ही रूठ कर खुद ही मान जाते हैं
चलो ये रास्ता दोनों साथ मिलकर पार करते हैं
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रिश्तों को स्थायित्व प्रदान करने की एक सुन्दर कोशिश और उसका प्रगटन. हार्दिक धन्यवाद. मुद्दतों बाद मिली फुरसत में.... बातें दो चार करते हैं चलो ये रास्ता दोनों साथ मिलकर पार करते हैं