तुम बिन मैं हूँ कैसे Poem by Kezia Kezia

तुम बिन मैं हूँ कैसे

तुम उड़ते बादल हो
मैं धरा अविचल हूँ
तुम दिन के उजाले हो
मैं रात का घोर अंधेरा हूँ
तुम बहता झरना हो अधीर
मैं ताल का ठहरा नीर
तुम ज्ञाताओं के ज्ञाता गंभीर
मैं दुर्बुद्धि अज्ञानी बीर
तुम दीया हो मैं हूँ बाती
तुम राग हो मैं गीत तुम्हारा
तुम कुँआ हो मैं हूँ नीर
तुम नदिया मैं हूँ तीर
तुम गुलाब की खिली पँखुड़ी
मैं उस पर पड़ी ओस की बूंद
तुम सावन हो मैं मोर
तुम डाली हो अमुआ की
मैं कूकती कोयल काली
तुम हवा का निर्मल झोंका हो
मैं उसमे बसी खुश्बू
मैं नैन हूँ तुम काजल हो
मैं अम्बर तुम हो बादल
मैं राही हूँ तुम मंजिल हो
मैं शरीर हूँ तुम ध़ड़कन हो
मैं अम्बर हूँ तुम तारे हो
मैं विशाल समंदर हूँ तुम लहरें
तुम बिन मैं हूँ कैसे
बिन बादल मलहार है जैसे
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