वो माटी बड़ी उपजाऊ थी Poem by Kezia Kezia

वो माटी बड़ी उपजाऊ थी

उस माटी में कण जुड़े हुए थे
गिरती बूँदों को अपनी गोद में पालती थी
जड़ों से जुड़कर रहती थी
किरर्किराहट का नाम भी नही था
हर एक घटक को मजबूती से
जकड़ कर रखे हुए थी
वो माटी बड़ी उपजाऊ थी
वो रेत कण कण होकर उड़ता था
किसी बूंद को पनाह देना उसकी
शान के खिलाफ था
जुड़ कर रहना उसे आता नही था
किरकिराहट बन आँखों में जाता था
वो रेत सूखा बंजर था

Tuesday, May 23, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
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